किस फसल की खेती भारत में सबसे लाभकारी खेती है?

सर्पगंधा की खेती इस समय भारत में करना सबसे अधिक मुनाफे की खेती है।

Rauwolfia serpentina

राउलफिया सर्पेन्टिना

उच्च रक्तचाप के लिए साल्ट बनाया जाता है इससे

सर्पगंधा की खेती की विधि

सर्पगंधा एक बहुवर्षीय औषधीय पौधा है जिसकी खेती इसकी जड़ों की प्राप्ति के लिए की जाती है कई जगहों पर इसे दो वर्ष की फसल के रूप में लिया जाता है तथा कही पर 3-4 वर्ष की फसल के रूप में।

इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर इसकी फसल से होने वाली प्राप्तियों में भी भिन्नता होती है।

एक अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए इसकी कृषि तकनीक से संबंधित विकसित किए गए प्रमुख पहलू अपनाना होगा।

सर्पगंधा की फसल की अवधि-

सर्पगंधा बहुवर्षीय फसल है तथा इसे 2 माह से 5 वर्ष तक के लिए खेत में रखा जाता है। परन्तु सर्पगंधा पर हुए शोध कार्यों से यह पता चलता है कि 18 माह की अवधि के उपरान्त फसल को उखाड़ लिया जाना चाहिए। हांलांकि यह भी पाया गया है कि जितने ज्यादा समय तक पौधा खेत में लगा रहेगा उसी के अनुरूप जड़ों की मात्रा में बढ़ोत्तरी होती जाएगी तथा दो साल की फसल की अपेक्षा तीन साल की फसल से ज्यादा उत्पादन नर्सरी में तैयार हो रहे सर्पगंधा के पौधे मिलता है, परन्तु अंतत: यह निष्कर्ष निकाला गया है कि इसकी खेती 30 माह अर्थात् ढाई वर्ष की फसल के रूप में की जाए जिससे एल्केलाइड भी पूर्णतया विकसित हो जाएं तथा उत्पादन भी अधिक हो।

खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

भारतीय महाद्वीप का मूल निवासी पौधा होने के कारण सर्पगंधा की खेती हेतु भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु काफी उपयुक्त है।

यूं तो ऐसे क्षेत्र जहां की जलवायु में ज्यादा उतार चढ़ाव न हों वे इसके लिए ज्यादा उपयुक्त हैं, परन्तु फिर भी देखा गया है कि यह 100 से लेकर 450 तक के तापमान में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। वैसे तो यह खुले क्षेत्रों में ज्यादा अच्छी प्रकार पनपता है परन्तु आंशिक छाया वाले क्षेत्रों में भी इसका अच्छा विकास होता है। ज्यादा पाले तथा सर्दी के समय इसके पत्ते झड़ जाते हैं तथा बसन्त आते ही पुन: नई कोपले आ जाती हैं। यद्यपि जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए यह उपयुक्त नहीं है। परन्तु यदि 2-3 दिन तक जल भराव वाली स्थिति बनती है तो ऐसी स्थितियां यह सहन करने की क्षमता रखता है। प्रकृति रूप में तो यह 250 से 500 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी प्रकार उगता एवं बढ़ता देखा गया है। इस प्रकार सामान्य परिस्थितियों में सम्पूर्ण भारतीय महाद्वीप की जलवायु, ऊपरी उत्तरांचल, ऊपरी हिमाचल, कश्मीर तथा किन्हीं उत्तर पूर्वी राज्यों तथा राजस्थान एवं गुजरात के रेगिस्तान वाले क्षेत्रों को छोड़कर शेष भारत की जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। अभी वर्तमान में इसकी आपूर्ति मुख्यतया उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आसाम, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों में हो रही है जो स्वाभाविक रूप से इसकी खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र माने जा सकते हैं। कटिंग (कलम) से तैयार किया गया सर्पगंधा का पौधा

उपयुक्त मिट्टी

सर्पगंधा की जड़ें भूमि में 50 सेंमी. तक गहरी जाती हैं अत: इसकी खेती ऐसी मिट्टियों में ज्यादा सफल हागी जिनमें जड़ों का सही विकास हो सके। इस दृष्टि से 6.5 पी.एच. वाली रेतीली दोमट तथा काली कपासिया मिट्टियां इसकी खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं।

बिजाई की विधि

सर्पगंधा की बिजाई हेतु मुख्यतया तीन विधियां प्रचलन में हैं- 1. तने की कलम से प्रवर्धन, 2. जड़ों से प्रवर्धन, 3. बीजों से

बीज से बिजाई करना : व्यवसायिक खेती की दृष्टि से सर्पगंधा के प्रवर्धन का सर्वोत्तम तरीका इसका बीजों से प्रवर्धन करना होता है, हालांकि बीजों से प्रवर्धन करने के रास्ते में सबसे बड़ी समस्या बीजों की उगाव क्षमता की है क्योंकि एक तो वैसे भी बीजों का उगाव कम (10 से 60) प्रतिशत ही होता है।, दूसरे बीज जितने पुराने होंगे उनकी उगाव क्षमता उतनी घटती जाएगी। वैसे यदि एकदम ताजे बीजों की बिजाई जाए तो उगाव क्षमता ज्यादा रहती है तथा 6 माह से ज्यादा पुराना बीज नहीं लेना चाहिए।

बीज प्राप्त करने तथा इनका ऊपरी छिलका (काले रंग वाला आवरण) उतार लेने के उपरान्त इनको नर्सरी में तैयार किया जाता है। इसके लिए लगभग 9 इंच से 1 फीट ऊंची उठी हुई (रेज़्ड) बैड्स बना ली जाती हैं। इन बीजों को रात भर पानी में भिगोकर रखा जाता है तथा कुछ बीज जो पानी के ऊपर तैरते दिखाई देते हैं उन्हें निकाल दिया जाता है।

बिजाई से पूर्व इन बीजों को थीरम (3 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से) उपचारित किया जाना उपयोगी रहता है। एक एकड़ की खेती के लिए लगभग 500 वर्ग फीट की नर्सरी पर्याप्त होती है। नर्सरी के बजाय बीजों को पोलीथीन की थैलियों में डालकर भी पौध तैयार की जा सकती है। नर्सरी अथवा पौलीथीन की थैलियों में हल्की नमी बनाकर रखना चाहिए। नर्सरी बनाए जाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय अप्रैल-मई माह का होता है। बीज से पौध तैयार करने में एक एकड़ के लिए 4 से 5 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। प्राय: 20 दिन के उपरान्त बीजों से उगाव होना प्रारंभ हो जाता है तथा उगाव की प्रक्रिया 50 दिन तक चलती है। नर्सरी में लगाए गए पौधों पर जब 4 से 6 तक पत्ते आ जाएं तो उन्हें सुविधापूर्वक उखाड़ करके मुख्य खेत में लगा दिया जाता है। मुख्य खेत में लगाने से पूर्व इन छोटे पौधों को गौमूत्र से उपचारित करना लाभकारी रहता है।

खेत की तैयारी

सर्पगंधा की फसल को कम से कम दो वर्ष तक खेत में रखना होता है। अत: मुख्य खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम खेत तैयार करते समय गहरी जुताई करके खेत में दो टन केंचुआ खाद अथवा चार टन कम्पोस्ट खाद तथा 15 किग्रा. बायोनीमा जैविक खाद प्रति एकड़ की दर से मिला दी जानी चाहिए। तदुपरान्त 45-45 सेमी. की दूरी पर खेत में 15 सेमी. गहराई के कुंड बना दिए जाते हैं।

कई बार बिना कुंड बनाए सीधे बिजाई की जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में खेत में खुरपी की सहायता से लगभग 6 इंच गहराई के गड्ढे बनाकर नर्सरी में तैयार किए गए पौधों को 30-30 सेमी. की दूरी पर रोपित कर दिया जाता है। इस प्रकार लगाए जाने पर लाइन से लाइन की दूरी 45-45 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30-30 सेमी. रहती है। रोपण के तत्काल बाद पौधों को सिंचाई दे देनी चाहिए।

सिंचाई की व्यवस्था

सर्पगंधा लम्बे समय की फसल है अत: इसकी अच्छी बढ़त के लिए सिंचाई की व्यवस्था होना आवश्यक है किन्तु सिंचाई देने में ज्यादा उदारता नहीं बरतनी चाहिए तथा पौधों को तरसा-तरसा करके पानी देना चाहिए। यदि पौधे को किन्हीं निश्चित अंतरालों पर अपने आप पानी दे दिया जाए तो जड़ें पानी की तलाश में नीचे नहीं जाएंगी अर्थात् जड़ों का सही विकास नहीं हो पाएगा। अत: सर्पगंधा के पौधों की सिंचाई के संदर्भ में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है तथा सिंचाई तभी की जानी चाहिए जब पौधों को इसकी वास्तविक आवश्यकता हो तथा पौधे लगभग मुरझाने से लग जाऐं।

सर्पगंधा के साथ अंर्तवर्तीय फसल

सर्पगंधा की खेती जहां कई अन्य फसलों के साथ ली जा सकती है वहीं इसके बीज में कई अन्य औषधीय तथा अन्य फसलें भी ली जा सकती हैं। अंतर्वतीय फसल के रूप में इसके साथ सोयाबीन की कम फैलने वाली प्रजातियों की खेती काफी उपयुक्त रही हैं इसी प्रकार इसकी खेती बाइबिडंग तथा आंवला आदि जैसे बहुवर्षीय पौधों के साथ-साथ सफेद मूसली, कालमेघ तथा भुई आंवला आदि जैसे कम अवधि के औषधीय पौधों के साथ भी सफलतापूर्वक ली जा सकती है।

सर्पगंधा की फसल के प्रमुख रोग तथा बीमारियाँ

सर्पगंधा की जड़ों पर कई प्रकार के किर्मी नीमैटोड्स विकसित हो सकते हैं। जिससे जड़ों के ऊपर छल्ले जैसे बन जाते हैं। इनसे सुरक्षा सर्पगंधा की सूखी जड़े़ं के लिए प्रति एकड़ 15 कि.ग्रा. बायोनीमा भूमि में डालना लाभकारी रहता है। पौधों के पत्तों पर पत्ती लपेटने वाले कीड़ों (केटरपिलर्स) का प्रकोप भी हो सकता है जिसके लिए 0.2 प्रतिशत रोगोर का स्पे्र किया जा सकता है। इसी प्रकार सिरकोस्पोरा रावोल्फाई नामक फफूँद द्वारा पौधे की पत्तियों पर धब्बे डाले जाने की स्थिति में मानसून से पूर्व 0.2 प्रतिशत डायथेन जेड-78 अथवा डायथेन एम-45 का छिड़काव करना लाभकारी रहता है। इस यूं तो यह फसल बहुधा कीड़ों तथा बीमारियों के प्रकोप से मुक्त रहती है परन्तु फिर भी उपरोक्तानुसार वर्णित कुछ रोग फसल पर आ सकते हैं। जिनसे समय रहते सुरक्षा की जाना आवश्यक होती हैं। विभिन्न जैविक विधियों जैसे नीम की खली का घोल, जैविक कीटनाशकों जैसे बायोपैकुनिल तथा बायोधन का स्प्रे तथा गोमूत्र का छिड़काव भी फसल को विभिन्न बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

फसल की वृद्धि तथा इसकी परिपक्वता

रोपण के लगभग छ: माह के उपरान्त सर्पगंधा के पौधों पर फूल आने प्रारंभ हो जाते हैं जिन पर फिर फल तथा बीज बनते हैं। इस संदर्भ में यदि फसल के प्रारंभिक दिनों में बीज बनने दिए जाए तो जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है क्योंकि ऐसे में सारी खाद्य सामग्री (फूड मेटेरियल) फलों तथा बीजों को चली जाती है तथा जड़ें कमजोर रह सकती हैं। अत: पहली बार आने वाली फूलों को नाखून की सहायता से तोड़ दिया जाता है तथा आगे आने वाले फूलों, फलों तथा बीजों को फलने तथा बढ़ने दिया जाता है। इनमें से पके हुए फलों को सप्ताह में दो बार चुन लिया जाता है। यह सिलसिला पौधों को अंतत: उखाड़ने तक निरन्तर चलता रहता है। इसी बीच माह जून-जुलाई में प्रति एकड़ एक टन केंचुआ खाद तथा 15 कि.ग्रा बायोनीमा जैविक खाद ड्रिलिंग करकें खेत में पौधों के पास-पास डाल दी जानी चाहिए।

जैसा कि पूर्व में वर्णित है, यूं तो सर्पगंधा की 18 माह की फसल में इसकी जड़ों में पर्याप्त तथा वांछित एल्केलाइड विकसित हो जाते हैं परन्तु पर्याप्त मात्रा में जड़ें प्राप्त करने के लिए इसे 2-3 अथवा 4 साल तक खेत में रखा जाता है। तथा सदी के मौसम में (दिसम्बर-जनवरी) में जब पौधों के पत्ते झड़ जाएं तब जड़ों को खोद लिया जाना चाहिए। वैसे भी जड़ों की हारवेस्टिंग सर्दी के समय करना ही ज्यादा उपयुक्त होता है क्योंकि उस समय इनमें एल्केलाइड्स की मात्रा अधिकतम होती है।

जड़ेंं उखाड़ने में विशेष सावधानियाँ

सर्पगंधा की फसल के संदर्भ में इसकी जड़ों को उखाड़ने में कुछ विशेष सावधानियां रखने की आवश्यकता होती है। क्योंकि इसकी जड़ों की छाल में सर्वाधिक एल्केलाइड्स की मात्रा होती है तथा जड़ों का 40 से 55 प्रतिशत भाग इस छाल का ही होता है अत: यह विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि जड़ों को उखाड़ते समय इनके साथ लगी छाल को हानि न पहुंचे। अत: जड़ों को सावधानी पूर्वक उखाड़ा जाना चाहिए। जड़ों को उखाड़ने के लिए कुदाली का उपयोग भी किया जा सकता है तथा सब-सायलर का भी।

उखाड़ने से पूर्व खेत में एक हल्की सिंचाई कर दी जाए तो जड़ों को उखाड़ना आसान हो जाता है। उखाड़ने के उपरान्त जड़ों के साथ लगी रेत अथवा मिट्टी को सावधानी पूर्वक साफ करना आवश्यक होता है। यह भी यह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि जड़ों की छाल को क्षति न पहुंचे। साफ कर लेने के उपरान्त इन्हें अच्छी प्रकार सुखाया जाता है। सुखाने के उपरान्त जड़ों में 8 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं बचनी चाहिए। सूखने पर ये जड़ें इतनी सूख जानी चाहिए कि तोड़ने पर ये ‘‘खट’’ की आवाज से टूट जाऐं। इन सूखी हुई जड़ों को सूखी जगह पर जूट के बोरों में रख कर संग्रहित कर लिया जाता है।

सर्पगंधा की खेती से कुल प्राप्तियां

विभिन्न विधियों से लगाई जाने वाली सर्पगंधा की फसल से मिलने वाली जड़ों की मात्रा में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। इस संदर्भ में तने की कलमों की अपेक्षा जड़ की कलमों (रूट कटिंग्स) तथा जड़ की कलमों की अपेक्षा बीज से लगाई गई फसल में जड़ों की मात्रा ज्यादा पाई जाती है।

इसी प्रकार यूं तो 18 माह की फसल में पर्याप्त तथा उपयुक्त एल्केलाइड्स विकसित हो जाते हैं। परन्तु इन्हें जितने ज्यादा समय तक खेत में लगा रहने दिया जाए उतनी ही उत्तरोत्तर जड़ों की मात्रा बढ़ती जाती है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि अठाहर महीने की फसल से प्रति एकड़ 880 किग्रा. तथा तीन वर्षा की फसल से 1320 किग्रा. सूखी जड़ें प्राप्त हुई र्है। इस प्रकार यदि 30 माह की फसल के अनुसार अनुमान लगाया जाए तो एक एकड़ से लगभग 1320 किग्रा. अथवा प्राप्ति होती हैं। वैसे यदि 8 क्विंटल जड़ें भी प्राप्त हों तथा जड़ों की प्राप्ति हो तथा जड़ों की बिक्री दर 5,0000 रू. प्रति क्विन्टल. 8 क्विन्टल से, मानी जाए तो इस फसल से किसान को लगभग 40,0000रू. की प्राप्तियां होगी। इसके साथ-साथ किसान को लगभग 25 किग्रा. बीज भी प्राप्त होंगे जिसकी 4000 रू. प्रति कि.ग्रा. की दर से बिक्री भी मानी जाए तो इससे किसान को लगभग 150,00रू. की अतिरिक्त प्राप्तियां होंगी। इस प्रकार इस 18 माह की फसल से किसान को लगभग 5,50000 लाख रू. प्रति एकड़ की प्राप्तियां होंगी। इनमें से यदि विभिन्न कृषि क्रियाओं पर होने वाला 6,2000 रू. का खर्च कम कर दिया जाए तो सर्पगंधा की फसल से किसान को प्रति एकड़ 488,000रू. का शुद्ध लाभ हो रहा है।

अगले दस साल तक इसकी खपत की पूर्ति कम रहेगी इसकी मांग के अनुरूप।

सर्पगंधा की फसल खेत मे लगी हुई।

 

सर्पगंधा के बीज।

 

सर्पगंधा के पौधे जड़े काटने के बाद।

 

सर्पगंधा के बीज।

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